सोमवार, 7 दिसंबर 2009

सब कुछ नहीं होता समाप्त
सब कुछ थोड़े ही सूख जाता है
बच ही जाती है स्मृति की नन्ही बूंद
मिल ही जाता है प्रिय का लगभग खो गया पता
अलगनी में सूखते हुए कपड़ो पर बच ही जाती है
देह गंध की नम आंच
पायंचे के घुटनों पर रेंग ही आती है मुलायमियत
मृत्यु के बाद भी बचे रहते है अस्थि फूल
सूखे जलाशय के तलछट में जीवित रहती है एक अकेली मछली
विशाल मरुस्थल की छाती पर सूरज के खिलाफ
लहराता है खेजरी का पेड़

सब कुछ नहीं होता समाप्त
हमारे बाद भी बचा रहता है जीने का घमासान
भूख के बावजूद बच ही जाते है थाली में अन्न के टुकड़े
निकल ही आता है पुराने संदूक से जीर्ण होता प्रेम पत्र
सबसे हारे क्षणों में मिल ही जाता है दोस्त ठिकाना
सब कुछ थोड़े ही मिट पाता है
उम्र के बावजूद भी बचे रहते है देह पर प्रेम निशान
जीवन के सबसे मोहक क्षणों में भी चिपका रहता है बीत जाने का भय
सब कुछ नहीं होता समाप्त।
मनीष मिश्र लखनऊ

मित्रो
यह ब्लॉग कविताओ को समर्पित है.इसमें मेरी कविताओ के अतिरिक्त वे सभी कविताये शामिल होंगी जो लोकप्रिय है. आप चाहे तो इसके सदस्य बन कर अपनी प्रतिक्रियाये और रचनाये शामिल कर सकते है.तो शुरुआत करते है एक रूहानी सफ़र का जिसका आगाज हो चूका है.
मनीष मिश्र